चकिया: गरला में मनरेगा बना लूट का जरिया! कागजों में दौड़ रहे 59 मजदूर, बिना फोटो के हाजिरी से लाखों की योजना पर सवाल
केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी मनरेगा योजना ग्रामीणों को रोजगार देने के लिए बनाई गई थी, लेकिन चकिया विकासखंड के गरला गांव में यह योजना रोजगार के बजाय भ्रष्टाचार का पर्याय बनती नजर आ रही है।

चकिया, चंदौली। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी मनरेगा योजना ग्रामीणों को रोजगार देने के लिए बनाई गई थी, लेकिन चकिया विकासखंड के गरला गांव में यह योजना रोजगार के बजाय भ्रष्टाचार का पर्याय बनती नजर आ रही है। गांव में मनरेगा कार्यों में बड़े पैमाने पर अनियमितता और फर्जीवाड़े के आरोप सामने आए हैं।
सूत्रों के अनुसार यहां 59 मजदूर केवल कागजों में कार्यरत दिखाए जा रहे हैं, जबकि वास्तविकता में कई नाम ऐसे हैं जो कार्यस्थल पर कभी दिखाई ही नहीं दिए। इसके बावजूद उनकी नियमित हाजिरी दर्ज कर सरकारी धन की निकासी की जा रही है। इतना ही नहीं, मनरेगा के नियमों को खुली चुनौती देते हुए कई श्रमिकों की बिना फोटो के ही ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज कर दी गई है, जिससे पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गया है।
ग्रामीणों का आरोप है कि गांव में एक ही कार्य को अलग-अलग समय पर नया दिखाकर बार-बार मस्टररोल जारी किया जा रहा है और उसी कार्य के नाम पर सरकारी धन की निकासी की जा रही है। यदि आरोप सही हैं तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं बल्कि सरकारी खजाने की संगठित लूट का मामला बनता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मनरेगा में ऑनलाइन मॉनिटरिंग, जियो टैगिंग और एनएमएमएस जैसी व्यवस्थाएं लागू हैं, तब भी बिना फोटो हाजिरी और फर्जी मजदूरों का खेल कैसे चल रहा है? क्या जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत के बिना यह संभव है?
ग्रामीणों ने मामले की निष्पक्ष जांच कराकर दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की है। वहीं प्रशासन की चुप्पी भी कई सवाल खड़े कर रही है। यदि समय रहते जांच नहीं हुई तो मनरेगा में पारदर्शिता के दावे केवल कागजी साबित होंगे और गरीबों के हक पर डाका डालने वालों के हौसले और बुलंद होंगे।
अब देखना यह है कि जिला प्रशासन गरला गांव में चल रहे इस कथित खेल की सच्चाई सामने लाता है या फिर मनरेगा की फाइलों में ही सब कुछ दफन कर दिया जाएगा।




