नौगढ़: ब्लॉक प्रमुख निधि से ‘कागजी मजदूरों’ का खेल! नौगढ़ में मनरेगा बना भ्रष्टाचार का अड्डा, सैकड़ों मजदूर सिर्फ रिकॉर्ड में सक्रिय
नौगढ़ विकास खंड में मनरेगा की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि ब्लॉक प्रमुख निधि से कराए जा रहे मनरेगा कार्यों में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं और वित्तीय गड़बड़ियां की जा रही हैं।

ब्लॉक प्रमुख निधि से ‘कागजी मजदूरों’ का खेल! नौगढ़ में मनरेगा बना भ्रष्टाचार का अड्डा, सैकड़ों मजदूर सिर्फ रिकॉर्ड में सक्रिय
चंदौली। नौगढ़ विकास खंड में मनरेगा की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि ब्लॉक प्रमुख निधि से कराए जा रहे मनरेगा कार्यों में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं और वित्तीय गड़बड़ियां की जा रही हैं। कई ग्राम पंचायतों में सैकड़ों मजदूरों की उपस्थिति केवल सरकारी अभिलेखों और मस्टररोल तक सीमित है, जबकि जमीनी स्तर पर न तो मजदूर दिखाई दे रहे हैं और न ही कार्यस्थलों पर उनकी अनिवार्य फोटो अपलोड की जा रही है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि पूरे मामले में सुनियोजित तरीके से सरकारी धन की बंदरबांट की जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि मनरेगा के नियमों को ताक पर रखकर कागजों में कार्य दिखाया जा रहा है और जिम्मेदार अधिकारी शिकायतों के बावजूद कार्रवाई करने के बजाय चुप्पी साधे हुए हैं।
आरोपों के अनुसार अमदहां चरनपुर में 108, बरबसपुर में 109, चिकनी में 158, धनकुंवारी कला में 149, गंगापुर में 432, लक्ष्मनपुर में 153, मझगांवा में 111, मंगरही में 149, मरवटिया में 242 तथा सेमरसाधोपुर में 132 मजदूर कार्यरत दिखाए गए हैं। ग्रामीणों का दावा है कि इनमें बड़ी संख्या में मजदूर केवल कागजों में ही मौजूद हैं और वास्तविक कार्यस्थलों पर स्थिति बिल्कुल अलग है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मनरेगा में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए एनएमएमएस ऐप के माध्यम से फोटो आधारित उपस्थिति अनिवार्य की गई है, तो बिना फोटो और बिना वास्तविक श्रमिकों के इतनी बड़ी संख्या में हाजिरी कैसे दर्ज हो रही है? यदि मजदूर काम नहीं कर रहे हैं तो उनके नाम पर भुगतान किसके खाते में जा रहा है? और यदि सब कुछ नियमों के तहत हो रहा है तो फिर कार्यस्थलों पर वास्तविक मजदूर क्यों नहीं दिखाई दे रहे?
ग्रामीणों का आरोप है कि इस पूरे खेल को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है, जिसके चलते जिम्मेदार अधिकारी जांच और कार्रवाई से बचते नजर आ रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि स्वतंत्र एजेंसी से भौतिक सत्यापन करा दिया जाए तो करोड़ों रुपये के संभावित घोटाले का खुलासा हो सकता है।
मनरेगा गरीबों को रोजगार देने की योजना है, लेकिन यदि आरोप सही हैं तो नौगढ़ में यह योजना रोजगार का नहीं बल्कि भ्रष्टाचार का माध्यम बनती जा रही है। जब सैकड़ों मजदूर केवल कागजों में काम कर रहे हों, फोटो गायब हों और अधिकारी मौन हों, तो यह केवल अनियमितता नहीं बल्कि सरकारी धन की संभावित लूट का मामला बन जाता है। अब जिला प्रशासन को कागजी रिपोर्टों से बाहर निकलकर जमीनी जांच करनी होगी। क्योंकि सवाल सिर्फ मजदूरों की हाजिरी का नहीं, बल्कि जनता के पैसे और शासन की विश्वसनीयता का है।




