शहाबगंज: खखड़ा में मनरेगा पर ‘डाका’! 191 मजदूर कागजों में काम पर, 20 मस्टररोल से सरकारी खजाने पर सेंध का आरोप, सवालों के घेरे में जिम्मेदार तंत्र
शहाबगंज विकासखंड के खखड़ा गांव में मनरेगा कार्यों को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं।

खखड़ा में मनरेगा पर ‘डाका’! 191 मजदूर कागजों में काम पर, 20 मस्टररोल से सरकारी खजाने पर सेंध का आरोप
चंदौली। शहाबगंज विकासखंड के खखड़ा गांव में मनरेगा कार्यों को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि गांव में चल रहे दो कार्यों के लिए 20 मस्टररोल जारी किए गए हैं, जबकि मौके पर मजदूरों की संख्या बेहद कम दिखाई देती है। इसके बावजूद रिकॉर्ड में 191 मजदूरों की लगातार हाजिरी दर्ज होने का दावा किया जा रहा है।
आरोप है कि महीनों से बड़ी संख्या में ऐसे श्रमिकों के नाम पर उपस्थिति दर्ज की जा रही है, जो वास्तव में कार्यस्थल पर मौजूद नहीं रहते। इतना ही नहीं, कार्य न करने वाले मजदूरों की हाजिरी और फोटो अपलोड किए जाने की भी चर्चा है। यदि आरोप सही हैं तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि सरकारी धन के सुनियोजित दुरुपयोग का गंभीर मामला बन सकता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में मजदूरों की ऑनलाइन हाजिरी और भुगतान संबंधी प्रक्रिया होने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी इस कथित खेल पर रोक क्यों नहीं लगा पा रहे हैं। ग्रामीणों के बीच यह चर्चा भी तेज है कि यदि समय रहते जांच नहीं हुई तो सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंच सकता है।
मनरेगा का उद्देश्य गांवों में रोजगार सृजन और विकास कार्यों को गति देना है, लेकिन खखड़ा में लगे आरोप इस योजना की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर रहे हैं। ग्रामीणों ने मामले की उच्चस्तरीय जांच कराकर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
सवालों के घेरे में जिम्मेदार तंत्र
- दो कार्यों के लिए 20 मस्टररोल जारी करने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
- 191 मजदूरों की उपस्थिति का भौतिक सत्यापन कब हुआ?
- कार्यस्थल पर वास्तविक मजदूरों की संख्या कितनी है?
- बिना काम किए हाजिरी और फोटो अपलोड होने के आरोपों की जांच कौन करेगा?
- सरकारी धन की संभावित बंदरबांट पर जिम्मेदार अधिकारी मौन क्यों हैं?
यदि खखड़ा में लगाए जा रहे आरोपों में सच्चाई है तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि गरीब मजदूरों के अधिकारों और सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता पर सीधा हमला है। अब निगाहें जिला प्रशासन और मनरेगा विभाग पर हैं कि वे इस मामले की निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाते हैं या फिर फाइलों के बोझ तले यह मामला भी दबकर रह जाएगा।




