चंदौली: सामने स्वच्छता का मेकअप, पीछे गंदगी का कब्रिस्तान: विकास भवन ने खोली प्रशासन की पोल
जिले में स्वच्छता अभियान के नाम पर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, अधिकारियों की बैठकों में सफाई व्यवस्था की लंबी-चौड़ी समीक्षा होती है, गांवों में जागरूकता के पोस्टर लगते हैं, लेकिन जब बात खुद सरकारी तंत्र के सबसे महत्वपूर्ण कार्यालय विकास भवन की आती है तो सारे दावे कूड़े के ढेर में दबे दिखाई देते हैं।

सामने स्वच्छता का मेकअप, पीछे गंदगी का कब्रिस्तान: विकास भवन ने खोली प्रशासन की पोल
चंदौली। जिले में स्वच्छता अभियान के नाम पर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, अधिकारियों की बैठकों में सफाई व्यवस्था की लंबी-चौड़ी समीक्षा होती है, गांवों में जागरूकता के पोस्टर लगते हैं, लेकिन जब बात खुद सरकारी तंत्र के सबसे महत्वपूर्ण कार्यालय विकास भवन की आती है तो सारे दावे कूड़े के ढेर में दबे दिखाई देते हैं।
विकास भवन का मुख्य द्वार देखकर ऐसा लगता है मानो स्वच्छता अभियान यहां पूरी तरह सफल हो चुका हो, लेकिन भवन के पिछले हिस्से में कदम रखते ही सरकारी दावों का नकाब उतर जाता है। वहां फैली गंदगी, कूड़े के ढेर, उगी झाड़ियां और टूटी बाउंड्री प्रशासनिक लापरवाही की ऐसी तस्वीर पेश कर रही हैं जिसे देखकर कोई भी शर्मसार हो जाए।
जिस भवन से गांवों की सफाई की निगरानी होती है, वहीं सड़ांध का साम्राज्य
विडंबना देखिए कि जिस विकास भवन से गांवों की सफाई व्यवस्था की निगरानी की जाती है, वहीं परिसर के पीछे गंदगी का साम्राज्य कायम है। कूड़े के ढेरों ने पूरे क्षेत्र को बदबूदार बना दिया है। बरसात शुरू होते ही यह इलाका मच्छरों, कीड़ों और जहरीले जीव-जंतुओं का सुरक्षित ठिकाना बन जाता है।
कर्मचारियों का कहना है कि कई बार सांप और अन्य जहरीले जीव कार्यालयों तक पहुंच चुके हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों के लिए यह कोई गंभीर विषय नहीं लगता। शिकायतें होती हैं, फाइलें चलती हैं, लेकिन सफाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति होती है।
क्या विकास भवन में स्वच्छता अभियान लागू नहीं होता?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या स्वच्छता अभियान केवल गांवों और जनता के लिए है? क्या सरकारी कार्यालय इसके दायरे से बाहर हैं? अगर जिले का विकास भवन ही गंदगी से पट गया है तो ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता की स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
मुख्य द्वार को चमकाकर तस्वीरें खिंचवा लेना आसान है, लेकिन पीछे छिपी सच्चाई यह बता रही है कि स्वच्छता अभियान कई जगह केवल फोटो और रिपोर्ट तक सीमित होकर रह गया है।
करोड़ों की योजनाएं, लेकिन अपने दफ्तर की सफाई नहीं
सरकार हर साल स्वच्छता पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। पंचायतों को बजट दिया जा रहा है। अधिकारियों को जिम्मेदारियां सौंपी जा रही हैं। इसके बावजूद विकास भवन की यह बदहाल स्थिति कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। आखिर सफाई के लिए जिम्मेदार विभाग अपने ही कार्यालय परिसर को साफ रखने में क्यों विफल हैं?
गंदगी पर मौन क्यों हैं जिम्मेदार?
हैरानी की बात यह है कि रोजाना सैकड़ों अधिकारी और कर्मचारी इसी परिसर से गुजरते हैं, लेकिन किसी की नजर इस गंदगी पर नहीं पड़ती। या फिर सब कुछ देखकर भी अनदेखा किया जा रहा है। यदि यही हाल रहा तो किसी दिन कोई बड़ी दुर्घटना या स्वास्थ्य संबंधी समस्या सामने आ सकती है।
सवाल जो जवाब मांगते हैं
- विकास भवन के पीछे कूड़े का अंबार किसकी जिम्मेदारी है?
- कर्मचारियों की शिकायतों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
- स्वच्छता अभियान के दावों के बीच विकास भवन की यह हालत क्यों?
- क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी?
विकास भवन की यह तस्वीर केवल गंदगी की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की है जो जनता को स्वच्छता का पाठ पढ़ाती है और खुद अपने आंगन की सफाई तक नहीं कर पाती। स्वच्छता अभियान की असली परीक्षा गांवों में नहीं, पहले विकास भवन के पीछे पड़े कूड़े के पहाड़ से शुरू होनी चाहिए।




