Chakia: नर्सरी में फोटो, ज़मीन पर सूखे पौधे, आखिर हरियाली की जिम्मेदारी किसकी
इन दिनों जिले में पौधा नर्सरियों के निरीक्षण का मानो एक नया चलन शुरू हो गया है। जनप्रतिनिधि एक-एक कर नर्सरियों का दौरा कर रहे हैं, पौधों की संख्या पूछ रहे हैं और कैमरों के सामने तस्वीरें खिंचवा रहे हैं।

नर्सरी में फोटो, ज़मीन पर सूखे पौधे, आखिर हरियाली की जिम्मेदारी किसकी
चंदौली। इन दिनों जिले में पौधा नर्सरियों के निरीक्षण का मानो एक नया चलन शुरू हो गया है। जनप्रतिनिधि एक-एक कर नर्सरियों का दौरा कर रहे हैं, पौधों की संख्या पूछ रहे हैं और कैमरों के सामने तस्वीरें खिंचवा रहे हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या हरियाली सिर्फ नर्सरी तक सीमित है, या उसकी असली परीक्षा तब शुरू होती है जब वही पौधा ज़मीन पर रोपा जाता है।
बरसात के मौसम में वन विभाग हर वर्ष बड़े पैमाने पर पौधारोपण अभियान चलाता है। कागजों में लाखों पौधे रोपे जाते हैं, लक्ष्य पूरे होते हैं और रिपोर्टें ऊपर भेज दी जाती हैं। कई स्थानों पर जनप्रतिनिधि भी पौधे लगाकर फोटो खिंचवाते हैं और अभियान की सफलता का संदेश दिया जाता है। लेकिन कुछ महीने बाद वही पौधे पानी, सुरक्षा और देखभाल के अभाव में दम तोड़ देते हैं।
विडंबना यह है कि नर्सरी में पौधों की गिनती करने वाले हाथ, रोपण के बाद उनकी सुध लेने के लिए शायद ही कभी आगे आते हैं। न तो नियमित निगरानी होती है और न ही यह आकलन कि लगाए गए पौधों में कितने जीवित बचे और कितने सूख गए।
यदि नर्सरी के निरीक्षण जितनी गंभीरता पौधों के संरक्षण और रखरखाव पर दिखाई जाती, तो आज हजारों पौधे घने वृक्ष बन चुके होते। वे न केवल पर्यावरण संतुलन में योगदान देते, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को छाया, स्वच्छ हवा और बेहतर जीवन भी प्रदान करते।
हरियाली कैमरे के फ्लैश से नहीं, बल्कि वर्षों की देखभाल से तैयार होती है। इसलिए समय की मांग है कि पौधारोपण को केवल औपचारिक अभियान या फोटो अवसर न बनाया जाए, बल्कि उसकी उत्तरजीविता सुनिश्चित करने के लिए जनप्रतिनिधि, वन विभाग और स्थानीय समुदाय मिलकर जवाबदेही तय करें। क्योंकि असली सफलता पौधे लगाने में नहीं, उसे वृक्ष बनने तक बचाने में है।



