शहाबगंज गांव: ब्लाक मुख्यालय के साये में मनरेगा की लूट, जिम्मेदार मौन, सिस्टम सवालों के घेरे में, लाखों का घोटाला
शहाबगंज विकासखंड के ही नाक के नीचे स्थित शहाबगंज ग्राम पंचायत में मनरेगा योजना को जिस तरह कागजों पर चलाया जा रहा है, वह न केवल व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है बल्कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका भी साफ संकेत देता है।

विकासखंड मुख्यालय के साये में मनरेगा की लूट, जिम्मेदार मौन, सिस्टम सवालों के घेरे में
चंदौली। शहाबगंज विकासखंड के ही नाक के नीचे स्थित शहाबगंज ग्राम पंचायत में मनरेगा योजना को जिस तरह कागजों पर चलाया जा रहा है, वह न केवल व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है बल्कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका भी साफ संकेत देता है। दर्जन भर फर्जी मजदूरों की पुरानी तस्वीरों के सहारे सैकड़ों मजदूरों की फर्जी हाजिरी भरना और एक ही कार्य के लिए 11 मस्टररोल जारी कर देना, यह महज अनियमितता नहीं, बल्कि सुनियोजित खेल है।
आंकड़ों के मुताबिक, 107 मजदूरों को कागजों में काम करता दिखाया गया है, जबकि जमीनी हकीकत शून्य है। सवाल उठता है कि जब विकासखंड कार्यालय खुद इसी ग्राम पंचायत में स्थित है, तो फिर यह खेल इतनी निर्भीकता से कैसे चल रहा है, क्या जिम्मेदार अधिकारी अनजान हैं या फिर जानबूझकर आंखें मूंदे बैठे हैं।
मनरेगा जैसी महत्वाकांक्षी योजना, जिसका उद्देश्य ग्रामीण गरीबों को रोजगार और आजीविका सुरक्षा देना है, उसे इस तरह कागजी रोजगार में बदल देना न केवल गरीबों के हक पर डाका है, बल्कि शासन की मंशा के साथ भी खिलवाड़ है। फर्जी मस्टररोल, पुराने फोटो और कागजी मजदूर, ये सब मिलकर उस सिस्टम की पोल खोलते हैं, जो पारदर्शिता और जवाबदेही के दावे करता है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इतने बड़े स्तर पर गड़बड़ी के बावजूद न तो कोई जांच दिख रही है और न ही किसी अधिकारी की जवाबदेही तय हो रही है। क्या यह माना जाए कि सिस्टम के भीतर ही इस खेल को संरक्षण प्राप्त है।
जरूरत है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो और मनरेगा जैसी योजना को कागजों के जाल से निकालकर वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुंचाया जाए। अन्यथा, विकास के नाम पर यह लूट यूं ही जारी रहेगी और गरीब मजदूर सिर्फ आंकड़ों में ही काम करते रह जाएंगे।




