गारंटी का खेल या राजनीति, ग्रामीणों को लेकर तहसील पहुंचे पूर्व विधायक, समाधान अब भी अधूरा
बोदलपुर गांव के भूमिहीनों को न्याय दिलाने के नाम पर पूर्व विधायक शिव तपस्या पासवान का तहसील पहुंचना जितना अचानक था, उतना ही सवालों से घिरा हुआ भी है। महीनों से लंबित पट्टा फाइलों पर जहां तहसील प्रशासन की सुस्ती साफ दिख रही है, वहीं पूर्व विधायक का यह दौरा भी केवल आश्वासन की राजनीति तक सिमटता नजर आया।

गारंटी का खेल या राजनीति, ग्रामीणों को लेकर तहसील पहुंचे पूर्व विधायक, समाधान अब भी अधूरा
चकिया, चंदौली। बोदलपुर गांव के भूमिहीनों को न्याय दिलाने के नाम पर पूर्व विधायक शिव तपस्या पासवान का तहसील पहुंचना जितना अचानक था, उतना ही सवालों से घिरा हुआ भी है। महीनों से लंबित पट्टा फाइलों पर जहां तहसील प्रशासन की सुस्ती साफ दिख रही है, वहीं पूर्व विधायक का यह दौरा भी केवल आश्वासन की राजनीति तक सिमटता नजर आया।
ग्रामीणों का कहना है कि उनकी कई पीढ़ियां ग्राम समाज की भूमि पर रह रही हैं, लेकिन कागजों में मालिकाना हक आज तक नहीं मिला। प्रधान द्वारा प्रस्ताव पास कर फाइलें तहसील में जमा कर दी गईं, मगर महीनों बीत जाने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब मामला इतना पुराना है, तो जनप्रतिनिधियों की सक्रियता अब क्यों जागी।
पूर्व विधायक शिव तपस्या पासवान ग्रामीणों के साथ तहसील तो पहुंचे, लेकिन तहसीलदार से मुलाकात तक नहीं हो सकी। ऐसे में यह दौरा केवल राजनीतिक उपस्थिति बनकर रह गया। हां, उन्होंने ग्रामीणों को गारंटी जरूर दे दी कि उन्हें न्याय मिलेगा—even मुख्यमंत्री से मिलने की बात भी कह डाली। लेकिन जमीनी सच्चाई यही है कि गारंटी से ज्यादा जरूरी कार्रवाई होती है, जो फिलहाल नदारद है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह दौरा वास्तव में ग्रामीणों की समस्या का समाधान करेगा या फिर यह भी अन्य राजनीतिक दिखावे की तरह समय के साथ ठंडा पड़ जाएगा, क्योंकि चकिया क्षेत्र में यह कोई पहला मामला नहीं है, जहां भूमिहीनों के पट्टे फाइलों में ही दबे रह गए हों।
अब देखना यह होगा कि पूर्व विधायक की गारंटी कितनी मजबूत साबित होती है, या फिर यह भी केवल एक और राजनीतिक बयान बनकर रह जाएगा, और बोदलपुर के भूमिहीन न्याय के इंतजार में यूं ही भटकते रहेंगे।




