चकिया में चुनावी मौसम से पहले ‘टिकट वीर’ सक्रिय, लेकिन भाजपा में दावेदारी से नहीं, भरोसे से मिलती है पहचान
विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन चकिया (सुरक्षित) विधानसभा क्षेत्र में टिकट की राजनीति ने अभी से रफ्तार पकड़ ली है।

चकिया में चुनावी मौसम से पहले ‘टिकट वीर’ सक्रिय, लेकिन भाजपा में दावेदारी से नहीं, भरोसे से मिलती है पहचान
चकिया, चंदौली। विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन चकिया (सुरक्षित) विधानसभा क्षेत्र में टिकट की राजनीति ने अभी से रफ्तार पकड़ ली है। राजनीतिक गलियारों में ऐसे चेहरों की भी सक्रियता बढ़ गई है, जिनकी पहचान चुनावी मौसम आते ही अचानक बढ़ जाती है। वर्षों तक जनता और संगठन से दूरी रखने वाले कुछ नेता अब खुद को बड़े दावेदार के रूप में पेश करने में जुटे हैं।
भाजपा जैसी कैडर आधारित पार्टी में केवल दावा कर देने से टिकट नहीं मिलता। संगठन के प्रति वर्षों की निष्ठा, कार्यकर्ताओं के बीच स्वीकार्यता, जनाधार और चुनाव जीतने की क्षमता ही सबसे बड़ी कसौटी होती है। ऐसे में केवल हालिया राजनीतिक सक्रियता किसी की दावेदारी को मजबूत नहीं बना देती।
चकिया सुरक्षित सीट का सामाजिक समीकरण भी बेहद संवेदनशील माना जाता है। यहां बहुजन समाज का वोट निर्णायक भूमिका निभाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मतदाता अब केवल चेहरे नहीं, बल्कि उनके संघर्ष, सामाजिक जुड़ाव और वर्षों के जनसेवा के रिकॉर्ड को भी तौल रहे हैं।
चुनावी मौसम में दावेदारों की भीड़ लगना नई बात नहीं है, लेकिन टिकट का फैसला नारे, प्रचार या चर्चाओं से नहीं होता। अंततः संगठन जिसे सबसे मजबूत और जनता के बीच सबसे स्वीकार्य मानता है, वही आगे बढ़ता है। इसलिए टिकट की दौड़ में शामिल नेताओं के लिए यह समझना जरूरी है कि राजनीति में शॉर्टकट नहीं, बल्कि लंबे समय का भरोसा ही सबसे बड़ी पूंजी होता है।




