शहाबगंज: मनरेगा या कागजी मजदूरों का महाकुंभ, रसिया गांव में 91 मजदूरों के नाम पर उठ रहे गंभीर सवाल, कमिशन खा चुके अधिकारी मौन
शहाबगंज विकासखंड के रसिया गांव में मनरेगा कार्यों को लेकर सामने आए दस्तावेज कई गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।

मनरेगा या कागजी मजदूरों का महाकुंभ? रसिया गांव में 91 मजदूरों के नाम पर उठ रहे गंभीर सवाल
चंदौली। शहाबगंज विकासखंड के रसिया गांव में मनरेगा कार्यों को लेकर सामने आए दस्तावेज कई गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। आरोप है कि यहां वास्तविक कार्यस्थल की बजाय कागजों पर मजदूरों की लंबी फौज खड़ी कर दी गई है। रिकॉर्ड में 91 मजदूरों के कार्य करने का दावा किया गया है, जबकि स्थानीय स्तर पर इसकी सत्यता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि एक ही महिला को अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग नामों से दर्शाए जाने का आरोप है। कहीं उसे समसुन बताया गया है तो कहीं अम्बीया बानो। इतना ही नहीं, कई मामलों में फोटो किसी व्यक्ति का और नाम किसी दूसरे का दर्ज होने की बात सामने आ रही है। यदि यह आरोप सही हैं तो यह केवल अनियमितता नहीं, बल्कि सरकारी धन के दुरुपयोग का गंभीर मामला है।
मनरेगा जैसी योजना का उद्देश्य ग्रामीण गरीबों को रोजगार उपलब्ध कराना है, लेकिन यदि मजदूरों की पहचान तक संदिग्ध हो जाए तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर भुगतान किसे और किस आधार पर किया गया। क्या जिम्मेदार अधिकारियों ने मस्टररोल, जॉब कार्ड और कार्यस्थल का सत्यापन किया था या फिर सब कुछ कागजी खानापूर्ति तक सीमित रहा?
हैरानी की बात यह है कि ऐसे आरोपों के बावजूद संबंधित विभाग की ओर से अब तक कोई प्रभावी कार्रवाई सामने नहीं आई है। इससे लोगों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि कहीं भ्रष्टाचार की इस पूरी व्यवस्था को प्रशासनिक संरक्षण तो नहीं प्राप्त है। यदि जांच में एक ही व्यक्ति के नाम, फोटो और पहचान में गड़बड़ी साबित होती है तो यह पूरे सिस्टम की जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न होगा।
अब जरूरत है कि जिला प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराए। मस्टररोल, जॉब कार्ड, आधार सत्यापन और बैंक खातों की गहन पड़ताल की जाए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि मनरेगा का पैसा वास्तव में मजदूरों तक पहुंचा या फिर कागजी मजदूरों के नाम पर सरकारी धन का खेल खेला गया।
जब एक ही महिला दो-दो नामों से मजदूरी कर रही हो, फोटो किसी और की और नाम किसी और का हो, तब सवाल सिर्फ रसिया गांव का नहीं रह जाता, बल्कि पूरे तंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही पर खड़ा हो जाता है। अब देखना यह है कि प्रशासन इन सवालों का जवाब देता है या फिर फाइलों के ढेर में सच को दफन कर दिया जाता है।




