चकिया: गौसेवा के नाम पर मौत का इंतज़ार! जनपद के सबसे बड़े गौशाला में तड़प रहे बेजुबान, चारा-दवा तक निगल गया भ्रष्टाचार, छुछाड़ गौशाला की बदहाली पर उठे सवाल, इलाज और पोषण के अभाव में पशुओं की हालत गंभीर
एक ओर सरकार गौवंश संरक्षण के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं दूसरी ओर धरातल पर व्यवस्थाओं की हकीकत बेहद चिंताजनक दिखाई दे रही है।
‘गौसेवा’ के नाम पर मौत का इंतज़ार! जनपद के सबसे बड़े गौशाला में तड़प रहे बेजुबान, चारा-दवा तक निगल गया भ्रष्टाचार?
छुछाड़ गौशाला की बदहाली पर उठे सवाल, इलाज और पोषण के अभाव में पशुओं की हालत गंभीर
चकिया, चंदौली। एक ओर सरकार गौवंश संरक्षण के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं दूसरी ओर धरातल पर व्यवस्थाओं की हकीकत बेहद चिंताजनक दिखाई दे रही है। स्थानीय विकासखंड के छुछाड़ ग्राम पंचायत स्थित जनपद के सबसे बड़े गौशाला में बेजुबान पशुओं की हालत बद से बदतर बताई जा रही है। आरोप है कि यहां पशु इलाज, पोषण और समुचित देखरेख के अभाव में तड़प रहे हैं तथा कई पशु मौत के मुहाने पर पहुंच चुके हैं।
ग्रामीणों और पशुप्रेमियों का कहना है कि गौशाला में पशुओं को निर्धारित मानकों के अनुरूप न तो पर्याप्त हरा चारा मिल रहा है और न ही प्रोटीन युक्त आहार। केवल नाममात्र का सूखा भूसा डालकर जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ रहे हैं। जबकि शासन की गाइडलाइन के अनुसार गौवंशों के लिए संतुलित आहार, हरा चारा, नियमित स्वास्थ्य परीक्षण और दवा-इलाज की व्यवस्था अनिवार्य है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पशुओं के भरण-पोषण, दवा और देखरेख के लिए सरकारी धन नियमित रूप से खर्च किया जा रहा है, तो फिर गौशाला में पशुओं की यह दयनीय स्थिति क्यों है? क्या कागजों में चारा और दवाओं का पूरा इंतजाम दिखाकर सरकारी धन का बंदरबांट किया जा रहा है? यदि ऐसा नहीं है तो जिम्मेदार अधिकारी और संचालक इस स्थिति के लिए जवाबदेह कौन है?
गौशाला की तस्वीरें और हालात कई गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। पशुओं के शरीर पर कमजोरी साफ दिखाई दे रही है। पर्याप्त पोषण और चिकित्सकीय सुविधा के अभाव में कई गौवंश बीमार बताए जा रहे हैं। ऐसे में यह गौशाला संरक्षण केंद्र कम और उपेक्षा का प्रतीक अधिक नजर आ रही है।
गौवंश संरक्षण केवल सरकारी फाइलों और बैठकों का विषय नहीं है। यदि गौशालाओं में बेजुबान पशु भूख, बीमारी और लापरवाही के कारण दम तोड़ने को मजबूर हैं, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि संवेदनहीनता का भी प्रमाण है। छुछाड़ गौशाला के मामले में जिला प्रशासन को तत्काल उच्चस्तरीय जांच करानी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पशुओं के नाम पर आवंटित हर रुपये का हिसाब सार्वजनिक हो। क्योंकि सवाल केवल धन के दुरुपयोग का नहीं, बल्कि उन बेजुबान जीवों के जीवन का है जो अपनी पीड़ा स्वयं बयान भी नहीं कर सकते हैं।
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