तहसील की जमीन पर वन विभाग का दबंगई ऑपरेशन , महिलाओं के तेवर के आगे बैकफुट पर आया प्रशासन
अलीपुर भंगड़ा मजगावां गांव में शनिवार को उस समय माहौल विस्फोटक हो गया जब तहसील की भूमि पर चल रहे मिट्टी खनन को वन विभाग ने अचानक जंगल की जमीन बताकर जेसीबी और ट्रैक्टर-ट्राली कब्जे में लेने की कोशिश की।

तहसील की जमीन पर वन विभाग का दबंगई ऑपरेशन
महिलाओं के तेवर के आगे बैकफुट पर आया प्रशासन
चकिया, चंदौली। अलीपुर भंगड़ा मजगावां गांव में शनिवार को उस समय माहौल विस्फोटक हो गया जब तहसील की भूमि पर चल रहे मिट्टी खनन को वन विभाग ने अचानक जंगल की जमीन बताकर जेसीबी और ट्रैक्टर-ट्राली कब्जे में लेने की कोशिश की। देखते ही देखते गांव की महिलाएं, किसान और ग्रामीण सड़क पर उतर आए और प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी शुरू हो गई। हालात इतने तनावपूर्ण हो गए कि पुलिस, पीएसी जैसी स्थिति बन गई और कई थानों की फोर्स के साथ अग्निशमन दल तक बुलाना पड़ा।
ग्रामीणों का आरोप है कि वन विभाग ने बिना स्पष्ट दस्तावेज दिखाए कार्रवाई शुरू कर दी और जब विरोध हुआ तो दबाव बनाकर मशीनें उठाने का प्रयास किया गया। लेकिन गांव की महिलाओं ने मोर्चा संभाल लिया। ट्रैक्टर के सामने बैठकर मिट्टी सड़क पर गिरा दी गई और प्रशासन मुर्दाबाद के नारे गूंजने लगे।
मामला उस समय और गरमा गया जब गायघाट निवासी जेसीबी संचालक व समाजवादी पार्टी नेता महेंद्र कुमार राव ने वन विभाग पर गंभीर राजनीतिक आरोप जड़ दिए। महेंद्र राव ने कहा कि वन विभाग के कुछ अधिकारी लगातार उन पर भारतीय जनता पार्टी ज्वाइन करने का दबाव बना रहे हैं। आरोप लगाया कि कहा जाता है भाजपा में आ जाओ, नहीं तो तुम्हारी जेसीबी और नेतागिरी दोनों बंद करा देंगे।
यह बयान सामने आते ही पूरे इलाके में राजनीतिक साजिश और प्रशासनिक दुरुपयोग को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। ग्रामीणों का साफ कहना है कि जिस जमीन पर मिट्टी निकाली जा रही थी वह तहसील की भूमि है और किसान नीरज के पास उसकी खतौनी तक मौजूद है। किसान का कहना है कि निजी कार्य के लिए अपने खेत से मानक के अनुसार मिट्टी निकलवाई जा रही थी, लेकिन वन विभाग ने जबरन कार्रवाई शुरू कर दी।
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि यह पूरा विवाद पुराने राजनीतिक और व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा है। कुछ दिन पहले एक पत्रकार के साथ हुई मारपीट मामले में महेंद्र राव ने पैरवी की थी। आरोप है कि उसी प्रकरण से नाराज कुछ दबंग और सत्ता से जुड़े लोगों के इशारे पर वन विभाग कार्रवाई के नाम पर बदले की राजनीति कर रहा है।
स्थिति इतनी बिगड़ गई कि मौके पर चकिया सीओ रघुराज, इंस्पेक्टर अर्जुन सिंह, इलिया व शहाबगंज पुलिस के साथ कई 112 वाहन और वन विभाग की टीम पहुंच गई। हालांकि उग्र महिलाओं और ग्रामीणों के भारी विरोध को देखते हुए प्रशासन आखिरकार बैकफुट पर आ गया और कार्रवाई ठंडी पड़ गई।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि जमीन वास्तव में वन विभाग की थी तो तत्काल दस्तावेज सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए और यदि तहसील की भूमि थी तो फिर वन विभाग किस अधिकार से पर कार्रवाई करने पहुंच गया।
ग्रामीणों में इस घटना को लेकर भारी आक्रोश है। लोगों का कहना है कि सत्ता और विभागीय ताकत के दम पर गरीब किसानों और विपक्षी विचारधारा से जुड़े लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। गांव में पूरे दिन इस मुद्दे को लेकर तनाव बना रहा और लोग इसे प्रशासनिक मनमानी का खुला उदाहरण बताते रहे। हालांकि खबर लिखे जाने तक वन विभाग द्वारा किसी प्रकार की प्रशासनिक कार्रवाई नहीं की गई थी।




